मंगलवार, 19 जून 2012

अनपढ़ रसूल को लिखना पड़ा !


इस्लाम असल में अरबी साम्राज्यवादी नीतियों का नाम है . जिसे मुहम्मद साहब ने प्रारंभ किया था .वह किसी न किसी तरह से सम्पूर्ण विश्व पर हुकूमत करना चाहते थे .लेकिन दूसरे क्षेत्रों को जीतने के लिए सेना की जरुरत होती है . जो उनके पास नहीं थी . इसलिए मुहम्मद ने ढोंग और पाखंड का सहारा लिया ..जैसे पहले तो खुद को अल्लाह का रसूल साबित करने के लिए यह अफवाह फैला दी कि मैं तो अनपढ़ हूँ . और जो भी मैं कुरान के माध्यम से कहता हूँ वह अल्लाह के वचन हैं ..जैसे पहले तो खुद को अल्लाह का रसूल साबित करने के लिए यह अफवाह फैला दी कि मैं तो अनपढ़ हूँ . और जो भी मैं कुरान के माध्यम से कहता हूँ वह अल्लाह के वचन हैं 


1-अल्लाह ने अनपढ़ ही बनाया 
कुरान-"और उसी अल्लाह ने अनपढ़ लोगों के बीच में एक अनपढ़ रसूल को उठाया जो हमारी आयतें सुनाता है "सूरा - जुमुआ 62 :2 
"जो लोग उस अनपढ़ रसूल के पीछे चलते हैं , जो न लिख सकता है और न पढ़ सकता है , तो पायेंगे कि उसकी बातें तौरैत और इंजील से प्रमाणित होती हैं "सूरा -अल आराफ 7 :157 
"हे रसूल न तुम कोई किताब लिख सकते हो और न पढ़ सकते हो . यदि ऐसा होता तो लोग तुम पर शक करते "सूरा -अनकबूत 29 :49 
 के अनुसार मुहम्मद साहब जीवन भर अनपढ़ ही बने रहे ,जैसा कि इन आयतों में दिया गया है ,
लेकिन मुसलमान रसूल के अनपढ़ होने को उनमे कमी मानने की जगह उनका चमत्कार बताते हैं .नहीं तो उन पर यह आरोप लग जाता की कुरान उन्ही ने लिखी होगी 
2-रसूल मक्का से भागे 
उन दिनों अरब के लोग अपने ऊंट काफिले वालों को किराये देते थे .जिन से सामान ढोया जाता था .और मक्का यमन से सीरिया जाने वाले मुख्य व्यापारिक मार्ग में पड़ता था .लेकिन कुरान की जिहादी तालीम के कारण मुसलमान बीच में ही काफिले लूट लेते थे .इस से अरबों की कमाई बंद हो गयी थी .मुहम्मद साहब का कबीला कुरैश भी ऊंट किराये पर चलाता था .इस लिए वह लोग महम्मद के जानी दुश्मन हो गए .इस लिए अपनी जान बचाने के लिए सितम्बर सन 622 मुहम्मद साहब अपनी औरतों ,रखैलों और साथियों के साथ मक्का से मदीना भाग गए . और उसी दिन से हिजरी सन शुरू हो गया .में अरबी  इसे हिजरत यानी पलायन कहा जाता है .
3-हुदैबिया की संधि 
मदीना पहुंच कर भी मुहम्मद साहब कुरान की आयतें सुना कर मुसलमानों जिहाद के लिए प्रेरित करते रहे . और जिहादी वहां और आस पास शहरों में लूट मार करते रहे .और यह खबरें मक्का वालों को पता हो जाती थीं .मक्का के लोग मुहम्मद साहब का क्रूर स्वभाव जानते थे .और उनकी बात पर विश्वास नहीं करते थे .तभी छः साल तक मदीना में रहने के बाद इस्लामी महीने जिल्काद में मुहम्मद साहब ने "(उमरा"( काबा की यात्रा ) के बहाने मक्का जाने की तयारी कर ली .उनके साथ मदीना के लोग भी शामिल हो गए .यह खबर मिलते ही मक्का के लोग मुहम्मद साहब की हत्या योजना बनाने लगे .और घोषणा कर दी जो भी मुहम्मद की हत्या करेगा उसे भारी इमाम दिया जायेगा .और जब मुहम्मद साहब को यह सूचना मिली तो वह बीच रास्ते में ही हुदैबिया नाम की जगह रुक गए और बहाना कर दिया की मेरी ऊंटनी ने आगे जाने से मना कर दिया है .और वहीं से अली के द्वारा कुरैश के लोगों को सन्देश भेजा कि हम युद्ध नहीं समझौता करना चाहते है .इतिहास में इस समझौते को " हुदैबिया सुलहصلح الحديبية  "(The Treaty of Hudaybiyyah )कहा जाता है .यह संधि मार्च सन 628 ई० तदनुसार जुलकाद महिना हिजरी सन 6 को मक्का के कुरैश और मुसलमानों के बीच हुआ था .कुरैश की तरफ से " सुहैल बिन अम्र "और मुसलमानों की तरफ से मुहम्मद साहब थे .पहले दौनों पक्षों की शर्तें सुनाई गयी और जिन मुद्दों पर दोनो पक्ष राजी होगये थे . उनको लिखा गया था .लिखने का काम अली को दिया गया था .यह एतिहासिक संधि इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इस ने मुहम्मद को लिखने पर अपने सही करने पर मजबूर कर दिया था .और उनको अपने नाम के साथ रसूल अल्लाह शब्द हटाना पड़ा था 
Sahih al-Bukhari-Vol 3  Bk 50 Hadih 891


4-सुलह की शर्तें 
इस सुलह में कुरैश की तरफ से " सुहैल बिन अम्र " और मुसलमानों की तरफ से मुहम्मद के बीच यह शर्तें तय हुई थी .1 - मुसलमान अभी उमरा किये बिना ही वापस चले जाएँ .2 . और अगले साल उम्र के लिए आयें 3 . अपने साथ हथियार नही लायें .4 .जो मक्का के निवासी हैं वह अपने साथ बाहर के लोग साथ में नही लायें 5 .गैर मुसलमानों को मक्का से बहर नहीं जाने दिया जायेगा 6 .मक्का के लोगों को गैर मुस्लिमों से व्यापर की अनुमति होगी 7 . यह संधि दस साल के लिए वैध होगी .
( यह सभी शर्तें कुरान के हिंदी अनुवाद में सूरा न . 48 अल फतह के परिचय में पेज 936 में दिया है . जिसका अनुवाद फारुख खान ने किया है . और " मकतबा अल हसनात" राम पुर से प्रकाशित किया है )
इस सुलह का उल्लेख कुरान में इस तरह किया गया है ,
" और निश्चय ही अल्लाह ईमान वालों से राजी हुआ , जब रसूल एक पेड़ के नीचे खड़े होकर कुरैश के लोगों से हाथ में हाथ मिला कर सुलह की शर्तें तय कर रहे थे " सूरा -अल फतह 48 :18 


5-डर के मारे लिख दिया 
उस समय कुरैश के लोगों ने तय कर लिया था कि यदि मुहम्मद इस संधि पर सहमत नहीं होगा तो उसे और उसके साथियों को जीवित मदीना नहीं जाने दिया जायेगा .दी गयी हदीसों में यह बात इस तरह दी गयी है .,
"अनस ने बताया की जब कुरैश के लोगों के साथ सभी सातों शर्तें तय हो गयी . तो सुहैल ने अली से कहा कि लिखने से पहले सभी शर्तें लोगों के सामने जोर से सुना दी जाएँ .और जब अली सबसे पहले " बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम " लिखने लगे तो ,सुहैल ने टोक कर कहा "हम किसी रहमान और रहीम को नहीं जानते "हम तो सिर्फ अपने ही अल्लाह को जानते है , इसलिए लिखो " बिस्मिका अल्लाहुम्मा بسمك اللهمّ"यानि हमारे अल्लाह के नाम से और अली ने यही लिख दिया .और फिर जब अंतिम पंक्ति में अली लिखना चाह कि " मुहम्मद रसूलल्लाह " की तरफ से हम इन शर्तों को मानते हैं . तो यह सुनते ही कुरैश के लोग भड़क गए , और हम कैसे मानें कि मुहम्मद रसूल है .यह तो अब्दुल्ला का लड़का है .इसलिए या तो इस कागज को फाड़ो या युद्ध के लिए तैयार हो जाओ .तब रसूल ने अली से कागज लिया और खुद लिख दिया " मिन मुहम्मद बिन अब्दुल्लाह من محمد بن عبد الله  " यानि अब्दुल्लाह के बेटे मुहम्मद की तरफ से यह शर्तें स्वीकार की जाती हैं "
Muslim-Book 019, Number 4404:


इसी घटना को प्रमाणिक हदीस बुखारी में भी दूसरी तरह से दिया गया है 
"अल बरा ने कहा जब रसूल उमरा के लिए मक्का जा रहे थे , रास्ते में उनको कुरैश के लोगों ने घेर लिया . और कहा पहले जब तक तुम हमारी नहीं मानोगे , तुम्हें मक्का में नहीं घुसने देंगे 'और जब रसूल सभी शर्तें मान कर आखिरी में " रसूल अल्लाह " लिखने लगे तो कुरैश ने घोर आपत्ति जताई .तब रसूल ने कागज हाथ में लिया और खुद लिख दिया "हाजा मा मुहम्मद बिन अब्दुल्लाह कद वाकिफत अलैहि هذا ما محمد بن عبد الله قد وافقت عليه"यानी यही बातें हैं , जिन पर मुहम्मद बिन अब्दुल्लाह सहमत है .(This is what Muhammad bin Abdullah has agreed upon )


Sahih Bukhari-Volume 3, Book 49, Number 863 

हुदैबिया की इस सुलह ( संधि ) के बारे में जानकारी के लिए देखिये - विडियो Treaty of Hudaibiya:

http://www.youtube.com/watch?v=2765YaW-vT0&feature=related

6-मुहम्मद साहब के पत्र
मुहम्मद साहब ने अपने जीवन भर में कुल 92 पत्र और संधियाँ लिखवाई थी . और अधिकांश में हस्ताक्षर की जगह अपने नाम की मुहर लगा देते थे जिसमे लिखा होता था " मुहम्मद रसूल्लाह " लेकिन कुछ ऐसे भी पत्र और संधियाँ भी हैं , जिन पर मुहम्मद साहब ने आखिर में कुछ शब्द लिख कर अपने सही भी कर दिए थे .इसके लिए देखिये , विडियो 
Original Letters of Prophet Muhammad

http://www.youtube.com/watch?v=JB5R1a4bSUM&feature=fvst

अब इस से बड़ा और कौन सा प्रमाण हो सकता है कि मुहम्मद साहब खुद को अल्लाह का रसूल और कुरान को अल्लाह कि किताब साबित करने के लिए अनपढ़ होने का ढोंग और पाखंड करते थे .लेकिन अब हरेक व्यक्ति को पता हो जाना चाहिए कि मुहमद साहब के ढोंग क भंडा फूट चुका है .अर्थात कुरान अल्लाह की किताब नहीं है .और न मुहमद साहब अल्लाह के रसूल थे .

http://www.sunniforum.com/forum/showthread.php?54597-When-did-Prophet-(saw)-learn-to-read-and-write

शुक्रवार, 8 जून 2012

सभी अल्लाह जहन्नम में हैं !!


इस लेख का शीर्षक देखते ही लोग अवश्य चौंक जाएँगे ,और कह देंगे कि ऐसा नहीं हो सकता .लेकिन यही सत्य है .क्योंकि आजतक मुसलमानों को जो भी सिखाया जाता है ,और मुल्ले लोगों को इस्लाम के बुनियादी नियम और मान्यताओं के बारे में जो भी बताते रहते हैं ,कुरान और हदीसों से उसके विपरीत और उलटी बातें सिद्ध होती हैं .ऎसी ही कुछ मुख्य बातों के बारे में कुरान और प्रमाणिक हदीसों आधार पर विश्लेषण किया जा रहा है .ताकि लोगों का इस्लामी मान्यताओं के बारे में जो भ्रम है वह दूर हो जाये .जो अल्लाह की एकत्व , उसके अजन्मा होने , उसके न्याय , और जन्नत और जहन्नम के बारे में है .जैसे कि,
1-एक नहीं कई अल्लाह 
इस पहले भाग पर आपत्ति करने वाले और टिपण्णी करने वालों से निवेदन है कि वह पहले ठीक से अरबी व्याकरण सीख लें , फिर बात करें . क्योंकि कुरान से कई अल्लाह सिद्ध हो रहे हैं .फिर ध्यान से इन आयतों को पढ़ें .




"إِنَّا نَحْنُ نَرِثُ الْأَرْضَ وَمَنْ عَلَيْهَا  "
"हम ही इस पृथ्वी के और जो कुछ उस पर है उसके वारिस होंगे "सूरा - मरियम 19 :40 
( Surely We inherit the earth and all those who are on it, )
यदि हम पहली आयत को ध्यान से पढ़ें तो अल्लाह अरबी में खुद के लिए " नहनुنحنُ " शब्द का प्रयोग कर रहा है जिसका अर्थ हम या We होता है जो बहुवचन है और कई लोगों के लिए बोला जाता है .यानि अल्लाह व्यक्तियों का समूह है .
"وَلَقَدْ خَلَقْنَا الْإِنْسَانَ مِنْ صَلْصَالٍ مِنْ حَمَإٍ مَسْنُونٍ"
और हमने मनुष्य को सड़ी काली मिटटी और बजने वाले गारे से बनाया " सूरा-अल हिज्र 15 :26 
(We created man of clay that gives forth sound, of black mud in shape)
"وَالْجَانَّ خَلَقْنَاهُ مِنْ قَبْلُ مِنْ نَارِ السَّمُومِ   "
 हमने इस से पहले जिन्नों को लू की लपट से बनाया था " सूरा- अल हिज्र 15 :27 
(We created Jinn  before, of intensely hot fire. )
इसी तरह अगली दौनों आयतों में अरबी में " खलकना خلقنا" शब्द है , जिसका अर्थ है " हमने बनाया We created " यह भी बहुवचन है ,जो एक से अधिक लोगों को प्रकट कर रहा है . अगर अल्लाह एक होता तो वह अरबी में " खलक्नी خلقني" शब्द कहता जिसका अर्थ है "मैंने बनाया I created " जो एक वचन है 
इन आयतों के अतिरिक्त खुद अल्लाह ने स्वीकार किया है कि वह एक सत्ता नहीं एक समूह है , यह आयत देखिये ,
" हमारे अलावा और भी हैं जिन पर तुम कुदरत नहीं पा सके " सूरा -अल फतह 48 :21 
"وَأُخْرَىٰ لَمْ تَقْدِرُوا عَلَيْهَا  "48:21


2-अल्लाह अजन्मा नहीं है 

मुसलमानों को एक और भ्रम है कि अल्लाह का जन्म नहीं हुआ , लेकिन हदीसों से पता चलता है कि उसका समय , जीवनकाल यानि आयु होती है और आयु उसी कि होती है जिसका जन्म होता है .चूँकि उस समय सन , महीने और तारीख नहीं थे इस लिए आरबी में केवल "दहर دهر" शब्द आया है जिस अर्थ " आयु Age , काल Period या समय Time शब्द से काम लिया गया है . हदीसें देखिये ,
"अबू हुरैरा ने कहा , रसूल ने कहा है ,अल्लाह ने कहा है , आदम की संतान मेरा काल पूछ कर मुझे दुखी कर देते हैं , उन से कहो मैं भी दिन और रात के चक्र में फसा हुआ हूँ .और समय की तरह समाप्त होने वाला हूँ "
Sahih al-Bukhari, Volume 8, Book 73, Number 200
"अबू हुरैरा ने कहा , रसूल ने कहा है ,अल्लाह ने कहा है , जो लोग मेरी अवधि पूछ कर मुझे तंग करते हैं , उन से कह दो मेरी आयु समय की तरह है जो दिन और रात समाप्त होती जाती है "
Sahih al-Bukhari, Volume 9, Book 93, Number 583


इन हदीसों से साबित होता है कि अल्लाह समय धीमे धीमे समाप्त हो रहा था 
.
3-अल्लाह की पहिचान जाँघों से 
अल्लाह की सही पहिचान इबादत से नहीं बल्कि उसकी जांघों से होती है , इसलिए मुल्लों , और सभी मुसलमानों को चाहिए कि पहले अल्लाह के नीचे के कपडे निकल कर जांघें देख लें . फिर उसे सिजदा करें , यही रसूल ने कहा है , देख लो .
"सईदुल खुदरी ने कहा कि रसूल ने बताया ,कि अल्लाह कई प्रकार के हैं और कब कोई कहेगा कि मैं ही तुम्हारा अल्लाह हूँ , तो तुम कहोगे तू मेरा अल्लाह नहीं हो सकता और तुम उस से बात नहीं करोगे .तब लोगों ने पूछा कि हम उसे कैसे पहिचानें ,रसूल ने बताया जाँघों से .और जब अल्लाह नेअपनी जांघ उघाड़ कर दिखाई तो लोग पहिचान गए और सिजदे में गिर गए ."
Sahih Al-Bukhari, Volume 9, Book 93, Number 532s
"अबू हुरैरा ने कहा , रसूल ने इब्ने हातिम से कहा था , अगर तुम कभी अपने भाई से लड़ाई करो तो , उसके चेहरे पर घूंसा नहीं मारना .,क्यों अल्लाह ने मनुष्य का चेहरा अपने जैसा ही बनाया है "
Sahih Muslim, Book 032, Number 6325

4-भ्रष्टाचारी अल्लाह 
मुसलमान लोगों को धोखा दने के लिए कहते हैं , कि हमारा अल्लाह तो बड़ा न्यायकारी है . लेकिन हदीसों से साबित है कि अल्लाह के राज में बिलकुल अंधेर होता था .नीचे से ऊपर तक सभी बेईमान और भ्रष्टाचारी है .कोई मूर्ख भी ऐसे अल्लाह को नहीं मानेगा .
"अबू जर ने कहा कि एक बार रसूल के पास अल्लाह का फ़रिश्ता जिब्रील आया और बोला . मैं एक खुशखबरी लाया हूँ .कि अल्लाह बिना इबादत किये ही लोगों को जन्नत में दाखिल कर देगा .रसूल ने पूछा कि उसने चोरी , और बलात्कार भी किया हो तो भी .जिब्रील ने कहा हाँ , चाहे चोरी , डाका लूट , और बलात्कार या अप्राकृतिक सेक्स क्यों न किया हो , जन्नत जायेगा "
Sahih al-Bukhari, Volume 9, Book 93, Number 579


"अबू मूसा ने कहा तब रसूल ने बताया कि जब कियामत के दिन हिसाब होगा तो अल्लाह हरेक पापी मुसलमान की जगह एक एक निष्पाप यहूदी या ईसाई को जहन्नम में घुसेड देगा .और उनके बदले मुसलमान को छोड़ देगा ."
Sahih Muslim, Book 037, Number 6665


5-अल्लाह को धोखा 
.इस हदीस से पता होता है कि या तो अल्लाह लापरवाह है , या उसके फ़रिश्ते रिश्वतखोर हैं , वर्ना सबको उल्लू बनाकर नरक के लोग जन्नत में कैसे घुस गए .और उनको वहीँ क्यों रहने दिया गया .
" अनस बिन मलिक ने कहा की , रसूल ने बताया तब कुछ ऐसे भी लोग होंगे जो अपना हुलिया और रंग बदल लेंगे .फिर नजर बचा कर जहन्नम से भाग कर जन्नत में घुस जायेंगे और जन्नत के लोग उनको " अल जहन्नमयीन Al-Jahannamiyin'الجهنّميين " कहकर स्वागत करेंगे "
Sahih al-Bukhari, Volume 8, Book 76, Number 56


6-अल्लाह जहन्नम में गए 
इन अगली हदीसों से यही सिद्ध होता है कि जब यह सभी अल्लाह इतने बेईमान और अन्यायी थे तो जहन्नम में नहीं जाते तो क्या दुबई में जाते .यह वहीं के लायक हैं .और अभी भी वहीँ होंगे .क्योंकि जहन्नम का दरवाजा बंद है .
"अबू हुरैरा ने कहा , रसूल ने बताया , जब जन्नत और जहन्नम बहस कर रहे थे , तो जन्नत ने कहा कि मैं तो लाचार , कमजोर लोगों को पसंद करती हूँ और उन पर रहम करती हूँ तब जहन्नम ने कहा मुझे तो ढीठ , अन्यायी और प्रभावशाली लोग पसंद हैं , और उन्हीं से पूरी जगह भर दूंगी .और जब ऐसे ही लोगों को जहन्नम में डाला जा रहा था . जहन्नम ने तीन बार पूछा क्या अभी भी कोई बाकी रह गया है .अभी भी जगह खाली है तब अल्लाह को भेजा गया . जैसे ही अल्लाह ने जहन्नम के अन्दर पैर डाला , जहन्नम बोली " कत. कत "इतना काफी है . और द्वार बंद कर दिया गया 
.وسوف يقولون: القات! زراعة القات! زراعة القات! (كفى! كفى! كفى!).


Bukhari-Volume 9, Book 93, Number 541:
"अनस बिन मलिक में कहा कि रसूल ने बताया कि जब तक अल्लाह अन्दर नहीं घुसे जहन्नम पूछती रही , क्या कोई और आने से रह गया है . लेकिन जैसे अल्लाह ने प्रवेश किया , जहन्नम बोली बस बस काफी हो गया ,और सभी तरफ द्वार बंद हो गए "
Bukhari-Volume 8, Book 78, Number 654:
" अनस ने कहा रसूल ने बताया जिस समय लोगों को जननं में धकेला जा रहा था , और जहन्नम पूछ रही थी कि क्या अब भी कोई बाकी रह गया है , और जब अल्लाह अन्दर गए तो बोली कत कत , यानि काफी है .उसी के बारे में कुरान की इस आयात में लिखा है "
सूरा - काफ 50 :30 
" और उस दिन जब पूछा गया कि क्या जहन्नम पूरी तरह से भर गयी है , या अभी भी जगह खाली है ? " सूरा -काफ 50 :30 
Bukhari-Volume 6, Book 60, Number 371:


इस्लाम के सभी फिरके कुरान को प्रमाणिक मानते हैं , और चूँकि कुरान में इन आयतों में अल्लाह के लिए बहुवचन ( Plurel ) शब्द प्रयुक्त किया गया है , जिस से पता चलता है कि अल्लाह एक नहीं बल्कि एक समूह है .और हदीसों में जहाँ भी अल्लाह के जहन्नम में जाने की बात बताई गयी है , वहां सभी अल्लाह समझना चाहिए.यही नहीं जिन हदीसों में अल्लाह के जहन्नम में जाने की घटना बतायी है वह अरबी के व्याकरण के अनुसार " माजी " यानी "भूतकाल ( Past Perfect ) में दी गयी है . इसका अर्थ है . यह घटना हो चुकी है .और हदीस में अल्लाह के जहन्नम से वापस निकलने का कोई उल्लेख नहीं मिलता है . इसलिए हम कह सकते हैं कि, 


" आज भी अल्लाह जहन्नम में है " 

http://www.wilayat.net/index.php?option=com_sectionex&view=category&id=12&Itemid=60

रविवार, 3 जून 2012

बेशर्म औरत की नंगी हदीस !


इस्लामी धर्म ग्रंथों में कुरान के बाद हदीसों को ही प्रमाण माना जाता है . और इन्हीं के आधार पर ही इस्लामी कानून " शरियत " के नियम भी बनाए गए हैं . यहाँ तक मुसलमानों के रीति रिवाज , आचार विचार , खान पान के नियम भी अधिकाँश हदीसों के आधार पर ही होते हैं .क्योंकि मुसलमानों का दावा है कि जिस तरह कुरान में अल्लाह के वचन हैं , उसी तरह अल्लाह कि प्रेरणा से रसूल ने हदीसें भी बयान की थीं .बस अंतर इतना है कि कुरान का संकलन रसूल जीवन काल में ही हो गया था , और हदीसों का संकलन रसूल के इंतकाल के बाद हुआ था .इस से जो लोग इस्लाम के बारे में ठीक से नहीं जानते , उनको ऐसा भ्रम हो जाता है . कि शायद हदीसों में सदाचार , नैतिकता , या समाज को सुधारने के लिए निर्देश दिए गए होंगे .जिसकी प्रेरणा अल्लाह ने रसूल को दी होगी .परन्तु ऐसा नहीं है .मुहम्मद साहब को हदीसें कहाँ से सूझती थी ,और उनका क्या विषय था . यही इस लेख में दिया गया है ,
1-हदीस की प्रेरणा औरतों की फूहड़ बातें 
चूँकि इस्लाम में औरतों के लिए पढ़ना , गाना बजाना , बाहर जाना , और किसी प्रकार के मनोरंजन पर पाबन्दी है . इसलिए वह अपना दिल बहलाने के लिए घर में ही कोई रास्ता निकाल लेती थी. ऐसा ही मुहम्मद साहब की सबसे छोटी पत्नी आयशा भी करती थी . वह अडौस पडौस की फालतू औरतों को घर में बुला लेती थी .और सब मिल कर हर तरह की बातें करते थे . कई बार औरतें बेशर्म होकर अश्लील और फूहड़ बातें भी करती थी . वैसे तो मुहम्मद साहब औरतों पर पाबन्दी लगाने की बात करते थे , लेकिन जब आयशा के साथ उनकी पत्नियाँ और पडौस की औरतें निर्लज्ज होकर उन्ही के सामने अश्लील बातें करती थीं ,तो मुहम्मद साहब आनंद विभोर हो जाते थे .और उनकी अश्लील बातों प्रभावित हो कर जो भी कह देते थे .उसको भी हदीस समझ लिया जाता था .,ऐसी ही एक बेशर्म औरत की हदीस देखिये -
2-उम्मे जारा की नंगी हदीस 
अरबी में फूहड़ को Slutty ,وقحة और निर्लज्ज को صفيق  ,shameless कहा जाता है .इस हदीस को उम्मे जरा की हदीस कहा जाता है .और यह हदीस इसलिए महत्वपूर्ण है कि इस हदीस में द्विअर्थी ( Double Meanings ) शब्दों का प्रयोग किया गया है . और इस से मुहम्मद साहब चारित्रिक स्तर का सही पता चलता है .पूरी हदीस इस प्रकार है ,
" आयशा ने कहा कि अक्सर मुझ से मिलने के लिए पडौस की औरतें आया करती थी . एक बार मी अपने घर ग्यारह औरतों को बुलवाया , और उन से कहा कि वह अपने पतियों के बारे में और उनके साथ दाम्पत्य संबंधों की सभी बातें बिना शर्म के खुल कर बताएं .जिस को सुन कर रसूल थोड़े में ही सारी बात समझ जाएँ .और अपना निर्णय सबको बता सकें .
1 . पहली औरत - बोली मेरा पति एक ऐसे ऊंट कि तरह है , लगता है उस पर मांस का थैला लदा हो . जो देखने में तो अच्छा लगता है , लेकिन ऊपर नहीं चढ़ सकता .
2 . दूसरी औरत - बोली मेरा पति इतना ख़राब है कि उसका वर्णन नहीं कर सकती , उसके आगे और पीछे की सभी चीजें किसी भी तरह नहीं छुप सकती है .
3 .तीसरी औरत - ने कहा , मेरा पति भोंदू है ,वह मुझे ठीक से संतुष्ट नहीं कर पाता,यदि मैं टोकती हूँ तो तलाक की बात करता है . और चुप रहती हूँ तो मेरे चरित्र पर शक करता है .क्योंकि उसे अपनी औरत को खुश करना नहीं आता है .
4 . चौथी औरत -बोली , मेरा पति मक्का की सर्द रात की तरह ठंडा है .इसलिए न तो मुझे उस से कोई डर है और न मैं उसकी परवाह करती हूँ .
5 .पांचवीं औरत - ने बताया , मेरा पति बाहर तो चीता बना रहता है , और घर आते ही मुझ पर शेर की तरह हमला कर देता है . लेकिन जरा सी देर में ठंडा हो जाता है .और जैसे ही मैं उसको जाने को कहती हूँ फ़ौरन भाग जाता है .
6 . छठवीं औरत - बोली , मेरा पति भुक्खड़ है . उसे सिर्फ खाने से मतलब रहता है . वह खाने की कोई चीज नहीं छोड़ता . और खाते ही चादर ओढ़ कर सो जाता है .लेकिन मेरे शरीर को हाथ भी नहीं लगाता. यही मेरी परेशानी है .
7 . सातवीं औरत . ने बताया , देखने में तो मेरा पति काफी उत्साही लगाता है , लेकिन वह नामर्द है . फिर भी मुझे गर्भवती करने के लिए असभ्य तरीके अपना कर मुझे दौनों तरफ से इस्तेमाल करता है . जिस से मेरा शरीर घायल हो जाता है .
8 .आठवीं औरत -बोली मेरा पति एक फल की तरह है . जिसकी सिर्फ सुगंध ही अच्छी लगती है . लेकिन उसे जहाँ से भी टटोल कर दबाओ वह नर्म और पिलपिला प्रतीत होता है .
9 . नौवीं औरत . ने कहा . मेरा पति ऐसी बुलंद ईमारत की तरह है , जिसके अन्दर राख भरी हो .और मेरा छोटा सा घर अन्दर से मजबूत है . फिर भी मेरा पति घर के सामने ही बैठ जाता है . कभी अन्दर नहीं घुसता .
10 .दसवीं औरत - ने बताया ,मेरे पति का नाम " मालिक " है , और वह सचमुच का मालिक है . वह मुझे सजा कर उस ऊंट की तरह तारीफ करता है . जिसे चराने के लिए छोड़ दिया जाता है .फिर गले में घंटियाँ बांध कर हलाल करने की जगह भेज दिया जाता है .
11 . ग्यारहवीं औरत - उम्मे जारा ने कहा , मेरा पति अबू जरा , खूब खाता है और मुझे भी खिलाता है . उसने मुझे जेवर भी पहिनाए है . लेकिन खाने में बाद अनाज की बोरी की तरह पडा रहता है . एक दिन उसे रस्ते में एक सुन्दर गुलाम औरत दिखी , जो दूध दुह रही थी .साथ में ही दो बच्चे भी खेल रहे थे. और मेरे पति ने उस औरत से शादी कर ली .मेरे घर में जगह की तंगी है , और जब मेरा पति उस औरत को घर में लाया तो मैंने विरोध किया . इस पर मेरे पति ने मुझे खजूर की टहनी से खूब मारा .और मुझे तलाक दे दी . बाद मैं मैंने एक दूसरे आदमी से शादी कर ली , जो एक घुड सवार और तीरंदाज है .अब मुझे डर है कि कहीं यह व्यक्ति भी मुझे तलाक न दे दे .
आयशा ने कहा कि रसूल ने उम्मे जारा और सभी औरतों की सभी बातों को ध्यान से सुना .और उनका असली अर्थ भी समझ लिया .फिर उन से कहा
" आज से मेरे लिए आयशा और तुम में कोई अंतर नहीं है ,यानि तुम मेरे लिए आयशा की तरह और आयशा मेरे लिए तुम्हारी तरह है "

इसी हदीस को " हिशाम बिन उर्वा" ने भी दूसरे शब्दों में बयान किया है . लेकिन रसूल का निर्णय दौनों जगह एक ही है .

3 -हदीस की प्रमाणिकता 
यह हदीस सहीह मुस्लिम की किताब 31 में हदीस नंबर 5998 पर मौजूद है .जिसे इमाम मुस्लिम ने अपनी किताब में जमा किया था. इमाम मुस्लिम का जन्म हि० 202 यानि सन 821 में ईरान के शहर निशापुर में हुआ था .और मृत्यु हि ० 261 यानी सन 875 में हुई थी .इमाम मुस्लिम ने सारे अरब , सीरिया , इराक और मिस्र में घूम घूम कर लोगों से सहबियों के वंशजों का पता किया . और उन से पूछ पूछ कर तीन लाख हदीसें इकट्ठी कर लीं . और उन में से करीब 4 हदीसों को सही मन कर अपनी किताब में शामिल कर लिया . इमाम मुस्लिम का पूरा नाम "أبو الحسين مسلم بن الحجاج القشيري النيسابوري‎अबुल हुसैन इब्न हज्जाज इब्न मुस्लिम इब्न वरात अल कुशैरी निशापुरी " है इसलिए मुसलमान इस हदीस को सही मानते हैं .और ऐसी फूहड़ बातों में भी अध्यात्म यानि रूहानियत की बात साबित करने को कोशिश करते रहते हैं .


4-हदीस का निष्कर्ष 


चालाक मुस्लिम इस अश्लील हदीस की इस तरह से व्याख्या करते हैं कि सभी पुरुषों को दोषयुक्त साबित कर दिया जाये . और उनकी तुलना में मुहम्मद साहब को सर्वश्रेष्ठ ,चरित्रवान और पवित्र सिद्ध कर दिया जाये . जैसा इस विडिओ में दिया है ,
For The Flaws of Men: Hadith of Umm Zara

http://www.youtube.com/watch?v=eQgd2YMzMYI

लेकिन मुसलमान कुछ भी स्पष्टीकरण देते रहे , बुद्धिमान लोग मुहम्मद साहब की असली मंशा समझ जायेंगे ,जैसे बिल्लियों के झगड़े में बंदर ने फायदा उठा लिया था . उसी तरह पति पत्नी के आपसी मन मुटाव का फायदा मुहम्मद साहब उठाना चाहते थे .इस हदीस से साबित होता है कि इतनी औरतें होने के बाद और 55 साल कि आयु हो जाने पर भी उनकी नजर दूसरों की औरतों पर थी .वह चाहते थे जो औरतें अपने पतियों से असंतुष्ट हों वह उंनके पास आ जाएँ .और इसके लिए उन्होंने आयशा का सहारा लिया था .


" क्या दूसरों की पत्नियाँ पटाने वाला भी रसूल हो सकता है ?

http://www.themasjid.org/node/34