रविवार, 27 मई 2012

बाँसुरी बजाने वाले रसूल !


संगीत को भी ईश्वर को प्रसन्न करने और आत्मिक शांति का साधन माना जाता है .विश्व के लगभग सभी धर्मों में सगीत के वाद्यों के साथ ईश्वर की स्तुति गाने की परंपरा है .दुनिया में शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति होगा जिसे संगीत या गाने बजाने से नफ़रत होगी .लेकिन मुहम्मद साहब एक इसके अपवाद थे . जिनको संगीत से इतनी चिढ हो गयी थी कि उसे हराम कर दिया था .जिसका कोई तर्कपूर्ण कारण नहीं मिलता.
चूंकि मुसलमान ऐसे मुहम्मद साहब का अनुसरण करते है ,जिनकी कथनी और करनी में जमीन आसमान का अंतर है .क्योंकि वह जो कहते थे उसके विपरीत काम करना उनकी आदत थी .
मुहम्मद साहब ने गाना इसलिए हराम कर दिया था , क्योंकि उनकी आवाज . भर्राती हुई और फटी हुई थी .लेकिन उन्होंने जब किसी संगीत के वाद्य को हराम किया तो , वह खुद ही खूठे साबित हो गए 
.प्रमाण देखिये .
1-संगीतकार नबी राजा दाउद 
मुसलमान अल्लाह की चार किताबें , तौरैत , जबूर, इंजील और कुरान मानते हैं . और अल्लाह ने जबूर नामकी किताब इस्राएल के राजा दाउद को प्रदान की थी . जो इब्रानी भाषा में थी .जबूरزبور‎  को अंगरेजी में Pslam यानि स्तुति "praises" और हिब्रू में ( Tehillim, תְהִלִּים )कहते हैं .यह किताब बाइबिल के पुराने नियम में आज भी मौजूद है . इसमें 150 भजन हैं . जो हिब्रू के " कीना" नाम के छंद में हैं .इसे संगीत वाद्यों के साथ गाया जाता था .दाउद को अंगरेजी में David और हिब्रू में दविद (  דָּוִיד) कहा जाता है .इनका समय ई ० पू .1040–970 BC,है उस समय अल्लाह को संगीत से नफ़रत नहीं थी , क्योंकि अल्लाह के नबी " दाउद "एक श्रेष्ठ संगीतकार थे . और उन्होंने कई संगीत के वाद्यों का अविष्कार भी किया था. हार्प Harp . तुरही Trumpet ,ढपली आदि प्रमुख हैं .इसके अलावा राजा दाउद बांसुरी ( Flute ) भी अच्छी तरह से बजाया करते थे . और उसमे कई राग भी निकल सकते थे 
और जब वह यरूशलेम के मंदिर में होने वाले भजनों में अन्य वाद्यों के साथ अपनी बांसुरी भी बजाते थे तो उपस्थित लोग मंत्रमुग्ध हो जाते थे .
इसके बारे में बाइबिल में यह लिखा है ,
सभी पुजारी राजा दाउद द्वारा बनाये गए वाद्यों लेकर राजा के साथ खड़े हो गए .और यहोवा की स्तुति गाकर उसका धन्यवाद करने लगे "2 इतिहास 7 :6 
तब यहोवा का स्तुतिगान प्रारंभ हो गया . और इस्राएल के राजा दाउद के बनाये वाद्य बजने लगे .और उनके साथ दाउद भी अपनी बांसुरी (Flute ) बजाता रहा .और फूंकने वाले भी अपनी तुरहियाँ फूँकते रहे "2 इतिहास 29 :26 -27 
तुम भी राजा दाउद की तरह बांसुरी के साथ सारंगी से अपनी बुद्धि से तरह तरह के राग निकालो " आमोस -6 :5 
2-दाउद का ईश्वरीय संगीत .
कहा जाता है कि नबी दाउद ईश्वर कि स्तुति में जो सगीत वाद्य बजाते थे यसका प्रभाव केवल मनुष्यों पर ही नहीं जड़ चेतन सभी पर होता था.यहाँ तक पक्षी भी संगीत सुनने के किये दाउद के पास जमा हो जाते थे . यह खुद कुरान बताती है ,
हमने दाउद को महानता प्रदान की , और पर्वतों से कहा उसके साथ भजन गायें, फिर चिड़ियों ने भी उसका साथ दिया "सूरा -सबा 34 :10 
जब दाऊद बजाते थे , तो चिड़ियाँ इकट्ठी हो जाती थीं , और गाने लगती थीं " सूरा -साद 38 :19 


3-दाउद की बांसुरी को मिल गयी 
चूँकि मुहम्मद साहब जगह जगह जिहाद करते रहते थे , और खुद को अल्लाह का अंतिम रसूल मानने के कारण जोभी कीमती चीज लूट में मिल जाती थी उस में जो भी महत्वपूर्ण होती थी अपने पास रख लेते थे . उनको दौड़ की बांसुरी कैसे और कहाँ से मिली . इसके बारे में हदीस में विस्तार से नहीं लिखा है .लेकिन इस एक प्रमाणिक हदीस से पता चलता है कि मुहम्मद साहब के हाथों दाउद की बांसुरी लग गयी थी .यह बिलकुल सही हदीस है , जिसे इमाम बुखारी ने नक़ल किया है , इसलिए हिंदी के साथ अरबी और अंगरेजी भी दी जा रही है ,


"Narrated Abu Musa: That the Prophet said to him' "O Abu Musa! we have been given one of the musical wind-instruments of the family of David .' 


अबू मूसा ने कहा , कि एक दिन रसूल ने बताया हे अबू मूसा मुझे दाउद के घर से एक मुंह से फूंक कर बजाने वाला वाद्य ( बांसुरी ) मिला है "




"وروى أبو موسى: أن النبي قال له: "يا أبا موسى لقد أعطيت أنت واحدة من الأدوات الموسيقية الرياح من عائلة داود   "


    बुखारी - जिल्द 6 किताब 61 हदीस 568 

4-रसूल बांसुरी बजाते थे .
क्योंकि हमें पता है कि कुतर्क करना , अर्थ का अनर्थ करना , सत्य से इंकार करना मुसलमानों का स्वभाव है . और वह इस हदीस को भी गलत साबित करने का प्रयास करेंगे .लेकिन इस हदीस की व्याख्या से उनका भ्रम दूर हो जायेगा .इसमे साफ लिखा है , कि मुहम्मद साहब में दौड़ कि बांसुरी धरोहर की तरह छुपा कर नहीं रख लिया था . बल्कि उसे बजाकर कुरान का संगीत भी निकलते थे ,
इसलिए इसी हदीस की तफ़सीर देखिये .Explaning-

"He is saying Abu Musa has a beautiful voice for reciting Qur'an. and Prophet liked  to beautiful Qur'anic recitation on  the Flutes of David others as "musical wind-instruments of David" Notice the hadith below it speaking of  playing Qur'anic recitation  on flute .
इस हदीस की व्याख्या में दिया है कि अबू मूसा की आवाज बहुत ही मधुर थी . लोग उसकी  तुलना दाऊद की बांसुरी की ध्वनि से करते थे . इसलिए जब भी रसूल उस बांसुरी को फूंकते थे ,तो उस में से भी कुरान के पाठ जैसी आवाज निकलती थी .रसूल कहते थे मूसा , यह दाउद की बांसुरी कुरान का पाठ करती है. 




"، فهو يقول أبو موسى لديه صوت جميل لتلاوة القرآن الكريم. بعض الناس الرجوع إلى تلاوة قرآنية جميلة كما في المزامير الآخرين ديفيد بأنها "آلات موسيقية الرياح داود" لاحظ الحديث تحته الحديث عن تلاوة القرآن الكريم. "




(Explanation -of Sahih Bukhari, Virtues of the Qur'an, Volume 6, ( البخاري، فضائل القرآن، المجلد 6 )

इस हदीस से सिद्ध हो जाता है कि इस्लाम में धर्म के नाम पर परस्पर विरोधी बातों का संग्रह कर दिया गया है . ताकि विरोधियों को जब चाहे जीसी न किसी नियम के अधीन फसा जा सके . और अपमे लोगों को बचा जा सके .जैसे जब मुहम्मद साहब ने संगीत , और संगीत के वाद्यों को हराम कर दिया है , तो दरगाहों में और मजारों पर कव्वालियाँ क्यों होती हैं ? और जब उसी अल्लाह ने अपने नबी दाउद को संगीत के वाद्यों से स्तुति करने की अनुमति दे राखी थी, तो महम्मद साहब ने सगीत को हराम क्यों कर दिया .? और जब हराम ही कर दिया तो खुद दाउद कि बांसुरी क्यों बजाने लगे .

अब तो रसूल का नाम " वंशी बजैया " रख देना चाहिए .

http://answers.yahoo.com/question/index?qid=20090311002619AAUzgO2

मंगलवार, 22 मई 2012

रसूल का काफ़िर परिवार


कुछ ढोंगी पाखंडी लोग पहले भी ऐसा दावा कर चुके हैं कि, उनके पास चमत्कारी शक्तियां हैं ,या वह किसी का अवतार हैं .और कुछ लोग यह भी दावा कर चुके है कि वह अल्लाह के नबी हैं .और जब भी ऐसे लोगों से उनके दावों को साबित करने के लिए सबूत माँगा जाता है , तो वह लोगों को विश्वास करने और ईमान लाने को कहते हैं .फिर भी ऐसे पाखंडियों की हकीकत जाने बिना अज्ञानी लोग इनके अनुयायी बन जाते हैं .मुहम्मद साहब भी एक ऐसे ही विख्यात व्यक्ति थे जो खुद को अल्लाह का रसूल बताते थे . और कुरान को अल्लाह की किताब बताते थे .और भले ही मुहम्मद साहब और उनके जिहादियों ने मार मार कर या लालच देकर , कई लोगों को मुसलमान बना दियाथा , लेकिन खुद उनके कबीले कुरैश के लोग उनकी बातों पर कभी विश्वास नहीं करते थे .क्योंकि मुहम्मद साहब उन लोगों के सामने ही पैदा और जवान हुए थे . और वह उनकी नस नस से वाकिफ थे .
कुरैश के लोग और मुहम्मद साहब के परिवार लोग उनके और उनकी गढ़ी हुई कुरान के बारे में जो कहते थे वह खुद कुरान में इस तरह दिया गया है . लोग मुहम्मद साहब को इन नामों से पुकारते थे , जैसे -

1-झूठा 
"तुम्हारे कबीले के लोग तुम्हें झूठा बताते हैं " सूरा -फातिर 35 :4 
"यह लोग कहते हैं कि तुमने अल्लाह के नाम से झूठ बातें गढ़ रखी हैं " सूरा -अश शूरा 42 :24 
" तुम खुद ही अल्लाह के नाम से कुरान रचते हो "सूरा -सबा 34 :8 
2-जालसाज
" कुरान तो बस पहले लोगों की कहानियाँ ही हैं "सूरा - नहल 16 :24 
" आयतें तो तुम खुद ही बनाते रहते हो " सूरा - नहल 16 :101 
"यह तो एक शायर है जिसने खुद ही कुरान बना डाली है "सूरा -अल अम्बिया 21 :5 
" यह तो केवल निराधार बातें है , जो तुम सवेरे शाम लोगों को सुनाते रहते हो "सूरा - अल फुरकान 25 :5 
3-टोटके  बाज 
"लोग कहते हैं कि यह तो खुला पाखंडी और टोटके बाज है "सूरा -यूनुस 10 :2 
"यह कहता है कि तुम लोग अपने पूर्वजों के देवताओं को छोड़ कर कल्पित अल्लाह की इबादत करो . और इसने खुद कुरान बना ली है "
सूरा -सबा 34 :43 
" यह तो बड़ा पाखंडी है ,क्या इसने सभी देवताओं को मिला कर एक देवता बना लिया है "सूरा -साद 38 :4 

4-पागल कवि
"क्या हम इस पागल कवि के कहने पर अपना धर्म छोड़ डालें "सूरा-अस साफात -37 :36 
"यह तो एक उन्मादी कवि है .हम चाहते हैं कि इसकी दुर्घटना हो जाये "सूरा - अत तूर 52 :29 

5-भूत ग्रस्त  बावला 
"तू झूठ कहता है कि कुरान तेरे ऊपर उतरी है ,अवश्य ही तू एक दीवाना है "सूरा -अल हिज्र 15 :6 
" इसके ऊपर तो उन्माद का दौरा पड़ जाता है "सूरा -अल मोमिनून 23 :70 
"यह तो पढ़ा लिखा व्यक्ति है , फिर भी बावला बनता है "सूरा -अद दुखान 44 :14 
"हे मुहम्मद तुम आमने सामने बहस करो .तुरंत पता चल जायेगा कि तुम पागल हो "सूरा - सबा 34 :46 
6-मुहम्मद का काफ़िर परिवार 
कुरैश के लोगों की तरह मुहम्मद साहब के सभी चाचा (Uncles ) और चाचियों  (Aunties )ने कभी मुहम्मद साहब को अल्लाह का रसूल नहीं माना .बल्कि एक पाखंडी , ढोंगी और झूठा ही मानते रहे .और न मुहम्मद साहब की झूठी कुरान को पढ़ा और न सुना .और घर के अधिकांश लोग कभी मुसलमान नहीं बने .और न कभी नमाज पढ़ी .एक बार मुहम्मद साहब के चाचा जिसने उनको पाला था ,यह कहा था " मेरे भतीजे तुम इस्लाम के नाम पर जहन्नम की जो आग जला रहे हो वह क़यामत तक नहीं बुझेगी . और इस आग से सारी दुनिया खाक हो जाएगी "फिर भी मैं तुन्हें लोगों से बचाता रहूँगा . लेकिन मुसलमान नहीं बनूँगा . क्योंकि मुझे पता है की तुम पाखण्ड कर रहे हो .
.मुहम्मद साहब के दादा ( grand Father ) का नाम अब्द अल मुत्तलिब था .जिसके 8 बेटे थे . बड़ा लड़का अब्द अल इलाह यानि मुहम्मद साहब के पिता थे . जो मुहम्मद साहब के जन्म के कुछ दिन बाद ही मर गए थे .मुहम्मद साहबको उनके चाचा अबू तालिब ने पाला था .बाकि चाचाओं और चाचियों के नाम इस प्रकार हैं .
अ - मुसलमान चाचा -1 .हमजा 2 .अब्बास
ब- काफ़िर चाचा -1 .अबू तालिब 2 ,अबू लहब 3 ,जुबैर 4 .मकवान 5 .सफ़र 6 . हारिस
स -मुसलमान चाची-1 .सय्यदा साफिया
द- काफ़िर चाचियाँ -1 .उम्मे हकीम ( बैजा ) 2 .अरूही 3 .अतैका 4 .बर्रा 5 .अमीना
अर्थात चाचा के परिवार के 14 लोगों में से केवल 3 लोग मुसलमान बने थे .और मुहमद साहब के परिवार में केवल उनकी पत्नियां थीं जो मजबूरी के कारण मुसलमान बन गयी होंगी .
7-गैर अरब जिहादी 
पश्चिम के इतिहासकारों ने इस्लाम को एक विश्व स्तरीय लूट अभियान बताया है . क्योंकि मुहम्मद साहब की जिहाद में अरब के बहार के लोग भी उसमे शामिल होने के लिए दूर दूर से मक्का मदीना पहुँच जाते थे .और मुहम्मद साहब उनको अपना साथी (Companion ) यानि सहाबा की पदवी दे देते थे .ऐसे कुछ मुख्य विदेशी सहाबियों के नाम इस प्रकार हैं
1 .बिलाल बिन रिबाह ( हफ्शी ) 2 .सलमान फारसी ( ईरानी ) 3 .सुहैब ( रोमन ) 4 .अब्दुल रशीद कैस खान (बलूची )ऐसे अनेकों लोग थे जो माले गनीमत के ,और औरतों के लालच में जिहाद में भाग लेते थे .
लेकिन अधिकांश मुसलमान नहीं जानते कि भारत के केरल से भी एक व्यक्ति " चेरमान पेरुमाल Cherman Perumal " भी मक्का गया था .और मुहमद के साथ जिहाद में भाग लेता था . मुहमद ने उसका नाम " ताजुद्दीन " रख दिया था .यह सन 629 कि बात है . उस समय अरब और केरल के बीच समुद्र मार्ग से व्यापर होता था . और "मालिक बिन दीनार " नामक अरब चेरमन को मक्का ले गया था . और उसे मुहमद साहब से मिलवा दिया .और इसी गद्दार ने मुहम्मद साहब को भारत की धन सम्पति के बारे में जानकारी दी थी .जिस से अरबों में लालच पैदा हो गया .चूंकि मुहम्मद साहब की तरह जिहादी समुद्र से डरते थे .इसलिए चेरमान ने जमीनी रस्ते से हमला करने का सुझाव दिया था.चेरमान काफी समय तक आरब में रहा .और जब वह वापिस भारत आया तब तक मुहम्मद का देहांत हो गया था . तब मुहम्मद बिन कासिम ने सिंध पर हमला किया था .
इस लेख के माध्यम से यही बात साबित होती है कि इस्लाम तलवार के जोर से फैलाया गया था . और मुहम्मद साहब पाखंडी थे . उनके चाचा चची इसलिए मुसलमान नहीं बने क्योंकि वह मुहम्मद साहब से नहीं डरते थे .और उनकी आसलियत जानते थे .
नोट - यह लेख का पूर्वार्ध है , अगला भाग शीघ्र ही प्रकाशित होगा . कृपया प्रतीक्षा करिए .


http://www.answering-islam.org/Shamoun/mhd_amin2.htm


http://wiki.answers.com/Q/What_is_Prophet_Muhammad'_uncle's_name

सोमवार, 14 मई 2012

मुसलमानों का अल्लाह काना है !!


इतिहास में कई ऐसे धर्मात्मा राजाओं का उल्लेख मिलता जो अपने निष्पक्ष न्याय के लिए प्रसिद्ध है .और प्रजा में छोटे बड़े , गरीब अमीर का भेदभाव किये बिना सदा ही उचित निर्णय किया करते थे .इसीलिए लोग कहा करते थे कि हमारे राजा तो सबको एक ही नजर से देखते हैं .वास्तव में लोग उस राजा की प्रशंसा करने के लिए ऐसा कहते थे .और इसे राजा का सद्गुण और महानता बताते थे .

लेकिन यदि किसी व्यक्ति की एक आँख किसी कारण से फूट जाये , या जन्म से ही एक आंख हो , लोग उसे शारीरिक दोष या अपशकुन मानते हैं .लेकिन बहुत कम लोग इस बात को जानते होंगे कि अल्लाह की सिर्फ एक ही आँख है . (Allah has one eye ) यानि अल्लाह काना है .चालाक मुल्ले इस बात को अच्छी तरह से जानते कि उनका अल्लाह काना है , यानि वह काना है .लेकिन यह मुल्ले इस बात को साधारण मुसलमानों को नहीं बताते हैं .इसीलिए मुल्ले मुस्लिम बच्चों को सिर्फ कुरान याद या रटने पर जोर देते रहते . और कुरान को व्याकरण सहित अर्थ नहीं समझाते है . क्योंकि उनको डर लगा रहता है ,कि अगर मुस्लिम बच्चे कुरान का सही अर्थ जान लेंगे , तो  पढ़ते पढ़ते उनको उस आयात का अर्थ भी पता चल जायेगा .जिस बताया गया है कि अलह की सिर्फ एक ही आंख है .
1-अरबी व्याकरण का नियम 
अरबी भाषा व्याकरण की दृष्टि से काफी परिष्कृत और उन्नत है ,उसमे संस्कृत की तरह हरेक संज्ञा और सर्वनाम के तीन तीन वचन होते हैं ,जिसे अंगरेजी में (Numbers ) कहते हैं .अरबी में संज्ञा तीन वचनNumbers (أرقام)  होते हैं .जिन्हें वाहिद , तस्निया ,और जमा कहा जाता है .और एक चीज के लिए वाहिद , दो चीजों के लिए तस्निया , और अधिक चीजों के लिए जमा का प्रयोग किया जाता है .और अक्सर जो चीजें जोड़ी में (Pairs ) में होती हैं , उनके लिए तस्निया यानि द्विवचन (Dual Number ) का प्रयोग किया जाता है .जैसे हाथ , पैर , आँखें , कान आदि .हमेशा जोड़ी में होते हैं .इनके लिए द्विवचन का प्रयोग किया जाता है .लेकिन यदि किसी कारण से किसी का एक हाथ , पैर , कान या आंख नष्ट हो जाएँ तो ऐसी दशा में एक वचन का प्रयोग किया जाता है .यह अरबी व्याकरण का नियम है .
2-कुरान और अल्लाह की एक आंख 
पूरी कुरान में सिर्फ 9 बार अल्लाह को " अल बसीर الْبَصِيرُ " यानि सब देखने वाला कहा all seeer    गया है लेकिन एक भी जगह अल्लाह की आँखों के बारे में कुछ भी नहीं लिखा गया है .औरकिसी मुल्ले ने बताया की अल्लाह सब कुछ कैसे देखता ,और उसका नाम "अल बसीर " क्यों रखा गया है .और जैसे कोई कितना पाखंड करे , और सच पर पर्दा डालने की कोशिश करे एक दिन उसका भंडा फूट जाता है . उसी तरह मुहम्मद साहब ने अनजाने में अल्लाह के नाम से एक ऐसी आयत कह डाली जिस से पता चल गया कि उन के अल्लाह कि सिर्फ एक ही आंख है , यानि वह काना है .वह आयत इस प्रकार है ,


"وَعَدُوٌّ لَّهُ ۚ وَأَلْقَيْتُ عَلَيْكَ مَحَبَّةً مِّنِّي وَلِتُصْنَعَ عَلَىٰ عَيْنِي  "सूरा - ता हा 20 :39 

Eng -Transliteration  ."waAAaduwwun lahu waalqaytu AAalayka mahabbatan minnee walitusnaAAa AAala AAaynee "

(यह कुरान की सूरा क्रमांक 20 सूरा ता हा की आयत क्रमांक 39 का 22 वां शब्द है .)


इसका अर्थ है "मैने तेरे ऊपर अपना प्रेम उंडेल दिया ताकि तू मेरी आँख के सामने पाला जाये "
3-व्याकरण से सबूत
इस आयत के अंतिम शब्द में अल्लाह ने अरबी में " ऐनी عَيْنِي" अर्थात मेरी आँख  aynī-My eye" शब्द का प्रयोग किया है .जो व्याकरण के अनुसार सर्वनाम , स्त्रीलिंग , अधिकरण कारक और एक वचन शब्द है ( genitive feminine noun- 1st person singular possessive pronoun)और अरबी की व्याकरण से ही यही साबित होता है ,
"
اسم مجرور والياء ضمير متصل في محل جر بالاضافة  "

4-अल्लाह काना कैसे हुआ 
अल्लाह सदा से काना नहीं रहा होगा क्योंकि यहूदियों की किताब तौरेत , और ईसाईयों की बाइबिल ज़माने तक अल्लाह की दौनों ऑंखें रही होंगी . क्योंकि उनकी किताबों में कहीं नहीं लिखा की अल्लाह काना है .लगता है मुसलमानों का अल्लाह कोई मनुष्य होगा जिसके नाम से मुहम्मद साहब आयतें सुनाते रहते थे . और किसी जिहाद में उसकी एक आँख फूट गयी होगी .और वह काना हो गया होगा .

यह कोई कपोल कल्पित बात नहीं है , कुरान की आयत और अरबी व्याकरण से जाँच करने के बाद ही यह लेख प्रकाशित किया गया है .जिसको जाँच करना हो जाँच कर ले . और साबित करे कि अल्लाह की दो ऑंखें हैं .और अगर अल्लाह निराकार है तो कुरान में अल्लाह की सिर्फ एक ही आंख क्यों बताई गयी है .वर्ना हम यही कहेंगे 


"मुसलमानों का अल्लाह काना है "

रविवार, 6 मई 2012

इस्लाम शांति या आतंक ?


मुस्लिम नेता हमेशा लोगों के दिमागों में यही बात ठूंसने की कोशिश करते रहते हैं कि इस्लाम एक शांति का धर्म है . और उसका आतंकवाद से कोई सम्बन्ध नहीं है .लेकिब जब भी कोई मुस्लिम आतंकवादी पकड़ा जाता है , तो यह मुल्ले मौलवी और नेता चुप्पी साध लेते .या कहने लगते हैं कि आतंकवादियों का कोई धर्म नहीं होता है .लेकिन मुस्लिम आतंकवादियों को बचाने के लिए मानव अधिकारों की दुहाई देकर दिग्विजय सिंह और तीस्ता सीतल वाड जैसे लोग आगे हो जाते हैं .वास्तव में ऐसे लोग वही होते हैं , जो यातो वर्ण संकर यानि दोगले होते हैं , या जिनको मुस्लिम देशों से धन मिलता है ,या फिर वह लोग होते हैं जिनको इस्लाम और मुसलमानों की मानसिकता के बारे में ठीक से ज्ञान नहीं होता है .चूँकि लोगों को इस्लाम का सही ज्ञान देना बहुत जरूरी है ,इसलिए कुछ महत्वपूर्ण जानकारियाँ दी जा रही हैं .जो कुरान और हदीसों पर आधारित हैं . क्योंकि मुसलमान इन्हीं का पालन करते हैं .
1-असली इस्लाम आतंकवाद 
कुछ मुर्ख लोग इस्लामी आतंकवाद का कारण, मुसलमानों पर किये गए , अन्याय , अत्याचार , भेदभाव और उपेक्षा को बताते हैं , लेकिन मुसलमान आतंकवाद को इस्लाम का शुद्ध रूप मान उस में आनंद प्राप्त करते है , जैसा कि ईरान के मुल्ला आयातुलाह खुमैनी ने कहा है .
इस्लाम का असली आनंद लोगों कि हत्या करना और अल्लाह के लिए मर जाने ने है .
 "The purest joy in Islam is to kill and be killed for Allah "
"وأنقى الفرح في الإسلام هو القتل، ويقتل في سبيل الله "
2-तलवार के साये में जन्नत 
अब्दुल्लाह बिन किस ने कहा , एक बार रसूल एक व्यक्ति से लड़ रहे थे . तो उन्होंने अपनी तलवार लहराते हुए चिल्ला कर कहा , सुन लो जन्नत का दरवाजा तलवारों के साये तले होता है . यह सुनते ही अबू मूसा ने म्यान से तलवार निकाली, और नंगी तलवार लेकर रसूल के प्रतिद्वंदी की तरफ दौड़ा और उसे क़त्ल कर दिया ".सही मुस्लिम -किताब 20 हदीस 4681 
क्योकि इस्लाम की मान्यता है , जन्नत का द्वार तलवारों के साये के तले होता है .इसलिए मुसलमानों के लिए हत्याएं करना और जिहाद करना जरुरी है चाहे किसी ने उनका कुछ भी बुरा नहीं किया हो .
3-मुसलमान क्यों लड़ते रहते हैं 
मुसलमान किसी भी देश में रहें हमेशा फसाद करते रहते है , कई लोग इसका कारण राजनीतिक व्यवस्था और भ्रष्ट सरकारें बताते हैं , लेकिन असली कारण कुरान है , जो कहती है ,


وَأَعِدُّواْ لَهُم مَّا اسْتَطَعْتُم مِّن قُوَّةٍ وَمِن رِّبَاطِ الْخَيْلِ تُرْهِبُونَ بِهِ عَدْوَّ اللّهِ وَعَدُوَّكُمْ وَآخَرِينَ مِن دُونِهِمْ لاَ تَعْلَمُونَهُمُ اللّهُ يَعْلَمُهُمْ وَمَا تُنفِقُواْ مِن شَيْءٍ فِي سَبِيلِ اللّهِ يُوَفَّ إِلَيْكُمْ وَأَنتُمْ لاَ تُظْلَمُونَ.  سورة الأنفال-   Al-Anfâl  -8:60
तुम आसपास के सभी लोगों से लड़ते रहो , चाहे तुम उनको जानते भी नहीं हो , और युद्ध के लिए सभी साधनों ( टैंक , हवाई जहाज , मिसाइल ,और तोपें ) का प्रयोग करो .ताकि लोग भयभीत रहें .और लड़ाई के लिए तुम जो भी खर्चा करोगे अलह उसकी पूर्ति कर देगा , और अल्लाह अन्याय नहीं करता " सूरा -अनफ़ाल 8 :60 
4-जिहादी महान हैं 
भले दुनिया बहार के लोग और सुप्रीम कोर्ट भी जिहादी आतंकवादियों को अपराधी साबित कर दे लेकिन मुसलमान उनको महान और व्यक्ति और निर्दोष मानते रहेंगे . क्योंकि अल्लाह की नजर में उनका दर्जा सबसे बड़ा है .
जो लोग ईमान लाये और अल्लाह की राह में अपनी जानों से जिहाद किया अल्लाह के यहाँ सिर्फ उनके लिए बड़ा दर्जा है " सूरा - तौबा 9 :20
यही कारण है कि अजमल कसाब विरुद्ध सभी प्रमाण होने के बाद भी एक भी मुसलमान उसे अपराधी नहीं मानता.
5-अल्लाह का सनकी न्याय 
मुसलमानों का दावा है कि उनका अल्लाह बड़ा न्यायकारी और सर्वज्ञ है , लेकिन अल्लाह पूरा सनकी ,और पागल है , क्योंकि वह लोगों के कर्मो का फैसला कर्मो के गुण दोषों के आधार नहीं बल्कि कर्मों का वजन तौल कर करता है .
हम कियामत के दिन इंसाफ का तराजू रखेंगे और हिसाब करने के लिए हम काफी हैं " सूरा -अल अम्बिया 21 :47
अल्लाह के इसी सनकी इंसाफ के अनुसार आतंकवादी तौल पर सभी मुसलमानों पर भारी पड़ते है ,
6-जिहादी सब पर भारी है 
अबू हुरैरा ने कहा , रसूल ने कहा ,जब अल्लाह लोगों के कर्मो को तौलेगा , तो ,जो लोग नमाजें पढ़ते हैं और रोजे रखते हैं ,उनकी तुलना में जो जिहाद करते है और लोगों को मारते हैं , या खुद मर जाते हैं , उनका वजन अधिक निकलेगा . और अल्लाह उन्हीं जो जन्नत में जाने देगा ."
बुखारी -जिल्द 4 किताब 52 हदीस 46
7-आतंक से शांति 
अबू हुरैरा ने कहा कि एक बार रसूल ने कहा , मैंने हमेशा आतंक से ही जीत हासिल कि है . और जब में सो रहा था अल्लाह ने मुझे दुनिया के सभी खजानों कि चाभी दे कर कहा था , अपने लोगों से कहो वह दुनिया की सम्पूर्ण दौलत लूट कर तुम्हारे सामने रख दें , और दूसरों के लिए कुछ भी नहीं छोड़ें "
बुखारी - जिल्द 4 किताब 52 हदीस 220 
मुसलमानों कि वकालत करने वाले लोगों को पता होना चाहिए कि इस्लाम विश्व में शांति नहीं , बल्कि आतंकवाद से मरघट जैसा सन्नाटा फैलाना चाहता है .


http://muhammadanism.org/Terrorism/Terrorist_Mind.htm